Monday, 11 July 2011

अपने ब्लॉग की शुरुआत मैं दुष्यंत की इस लाइन के साथ करूँगा....बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ, मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं........तीन साल की पत्रकारिता में ऐसे कई मौके आये जब लगा की अपनी बात खुलकर लिखने के लिए सही मंच नहीं मिल रहा......या जो मैं लिखना चाहता हूँ वो मेरे अखबार में छापने की ताकत फिर कहें कि अधिकार मेरे से ऊपर बैठे लोगों को नहीं है........यही वजह है की ब्लॉग लिखकर अपनी बात रख सकूँ. इसी आशा के साथ कि कुछ तो अपनी मन की बात लिख पाउँगा......

No comments:

Post a Comment