आज आरक्षण फिल्म देखा. बढ़िया फिल्म है. .फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो दलितों या वंचितों के खिलाफ हो बल्कि फिल्म एक तरह से दलितों का समर्थन करती नजर आती है. आरक्षण नाम से ही लोग बवाल मचाने लग गए लेकिन फिल्म की कहानी दरअसल शिक्षा का दलाली करने वालों और कोचिंग सेंटर्स के बहाने शिक्षा का व्यवसायीकरण करने वालों के खिलाफ है. मेरा ये मानना है की जो लोग बिना फिल्म देखे ही फिल्मों पर विवाद खड़ा करते हैं ऐसे लोगों को जेल में डाल देना चाहिए..जिस फिल्म को हमारे देश की सेंसर बोर्ड पास करती है उसके बाद उस पर बवाल करने और राजनितिक रोटी सकने वालों को बक्शा नहीं जाना चाहिए..उन पर क़ानूनी कार्यवाही होनी चाहिए..प्रकाश झा की ये फिल्म उनकी पिछली फिल्म राजनीति से कहीं ज्यादा अच्छी है.दरअसल राजनीती में प्रकाश झा अपने फिल्मों में जो एक आदर्श रूप दिखाते है जिसके साथ आदमी खड़ा होना चाहता है वो राजनीति में नहीं था. फिल्म का हर पत्र धूसर था जिसका कोई सिधांत नहीं था जो कहीं से भी कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पता लेकिन इस फिल्म में अमिताभ का कॉलेज के प्रिन्सिप्ले के रूप में दिखाया गया आदर्शवादी रूप कहीं कहीं दिल को छूता है.
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