बलरामपुर पुलिस जिले के चांदो थाना क्षेत्र में मीना खलको फर्जी मुठभेड़ में मीना के साथ बलात्कार करने के बाद उसको गोली मरने की बात एन जी ओ बचपन बचाओ आन्दोलन ने कही है....पत्रिका में आज ये खबर छपी है.....ये बात तो पहले से तय थी कि पुलिस के जवानों ने ५ और ६ जुलाई की दरम्यानी रात उस १५ साल की युवती के साथ दुष्कर्म करने के बाद अपनी करतूतों को छुपाने के लिए उसे नक्सली बता दिया......छत्तीसगढ़ में पुलिस कई बार ऐसा कर चुकी है नक्सली क्षेत्रों में आम आदमी को मारने के बाद नक्सली बता दिया जाता है और पुलिस वाले ये सोचते हैं की आसानी से बच जायेंगे.साथ ही सरकार से मेडल भी मिल जायेगा....मीना खलको वाले केस में भी इन पुलिस वालों को केवल लाइन अटेच किया गया है....और जाँच की बात कही है जो अब तक शुरू भी नहीं हो पाई है ऐसे में इतने गंभीर मामले में सरकार कितनी संवेदनशील है इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है..... गंभीर सवाल ये है की जो कानून के रखवाले हैं, जिनके कंधो पर ला एंड आर्डर बनाये रखने की जिम्मेदारी है वे ही इस तरह के कृत्या करने लग जाएँ तो इसे किस अपराध की श्रेणी में रखा जाये...मेरे हिसाब से ऐसे पुलिस वालों को फांसी या फिर उम्र कैद की सजा दी जानी चाहिए...लेकिन सरकार ने कोई गंभीर निर्णय नहीं लिया है...इसलिए मानवाधिकार उल्लंघन की सरकार भी दोषी है क्योंकि इन पुलिस वालों को बचाने का प्रयास न केवल पुलिस विभाग कर रहा है बल्कि कठोर सजा नहीं देकर सरकार भी उनका बचाव ही कर रही है........बचपन बचाओ आन्दोलन या फिर कोई भी मानवाधिकार संगठन सरकार की खामियों को सामने लाती है तो आसानी से उसे कथित मानवाधिकार संगठन कह कर सरकार पल्ल्ला झाड़ने को कोशिश करती है न की अपनी गलतियों को सुधार कर लोगों को न्याय दिलाने की...
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