९ दिसंबर से केबल पर ई टीवी बंद है.......रमन सिंह कहीं न कहीं से गलत जरुर है इसीलिए मीडिया को देख लेने की धमकी देने के साथ ही चैनल का प्रसारण बंद करवा दिया और प्रदेश के अधिकांश शहरों का यही हाल है.......पत्रिका की प्रतियाँ जलाई जा रही है....पत्रिका ने सिलसिलेवार जिस तरह से प्रदेश के काले कारनामो को उजागर किया है उससे रमन सिंह के साथ ही उनके मंत्रिमंडल की नींद उड़ गयी है..... अपनी खीज निकालने के लिए ई टीवी और पत्रिका को एक एक करोड़ कि मानहानि का दावा करने के लिए रमन सिंह ने नोटिस दिया है.......जिस तरह का सलूक मीडिया के साथ किया जा रहा है उससे सरकार की तानाशाही झलकती है.......ऐसे में १९७५ के आपातकाल के लिए कांग्रेस और इंदिरा गाँधी को जी भरकर कोसने वाली भाजपा का असली चेहरा उजागर हो रहा है......और रमन सिंह अपने इस कारनामे से न केवल अपने लिए गड्ढा खोद रहे हैं बल्कि प्रदेश में भाजपा के लिए भी मुश्किलें पैदा करने वाले हैं......और उनकी पार्टी के ही लोग उनकी शिकायत दबी जुबान ही सही कर रहे हैं......साथ ही लाल, गुलाबी पर्चों के रूप में भी पार्टी और संघ के लोगों की भावनाएं बाहर निकल रही है....... खैर रमन सिंह ने अपने इस घटिया कारनामे से ये तो बता दिया है कि मीडिया कि अनदेखी नहीं की जा सकती और मीडिया अपनी औकात पे आ जाये तो अच्छे अच्छे धुरंधरों की हालत ख़राब कर सकता है....दरअसल हमारे प्रदेश में विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस एक जुट नहीं है नहीं तो इस सरकार के काले कारनामों की लम्बी लिस्ट बाहर निकलती साथ ही सरकार भी डरती.....हाल के दिनों में नन्द कुमार पटेल के नेतृत्व में कुछ जान जरुर आई है जिससे लगता है कि रमन सरकार को आने वाले आम चुनावों में पानी भरना न पड़ जाये........लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये उभरता है कि अगर कांग्रेस की सरकार बन जाये तो आम लोगों को क्या राहत मिल जाएगी और भ्रष्टाचार में किसी तरह का अंकुश लग पायेगा, ये तो विश्वास के साथ कहा ही नहीं जा सकता......बावजूद इसके परिवर्तन की दरकार तो है ताकि सरकार वर्तमान की तरह निरंकुश न हो जाये....
Thursday, 15 December 2011
मुगालते में सरकार
सरकार डर रही है की कहीं उसके चाहने वालों की लम्बी लिस्ट न बाहर आ जाये.....और प्रणव दा ये कह कर सिर्फ दिलासा देने की कोशिश कर रहे हैं कि विदेशों में ज्यादा काला धन जमा नहीं है लोगों द्वारा सिर्फ खोखले दावे किये जा रहे हैं लेकिन मुद्दा ये नहीं है कि विदेशों में जमा काला धन ज्यादा है या कम......मुद्दा ये है कि हमारे देश से गैर क़ानूनी तरीकों से भ्रस्टाचार के द्वारा कमाई की गई रुपयों को किस तरह वापस लाया जाये और ऐसे काले कारनामे करने वालों के नाम न सिर्फ सार्वजनिक किये जाएँ बल्कि इन्हें उचित दंड भी दिया जाये ताकि बाकी लोगों को इससे सबक मिले.......प्रणव दा ये कह कर मजाक जरुर कर रहें हैं कि हमारे देश के किसी भी सांसद का पैसा विदेशी बैंकों में जमा नहीं है....लेकिन पूरे देशवासी न सिर्फ जानतें हैं बल्कि पूरा विश्वास है कि सबसे ज्यादा पैसा हमारे देश के नेताओं का ही जमा है.......सरकार ने ये सोच ही लिया है की किसी का भी नाम जाहिर नहीं किया जायेगा ऐसे में लोगों को शायद ही पता चले .......और प्रणव दा इस मुगालते में रह सकतें हैं कि उनका दावा सही था......
Monday, 10 October 2011
जगजीत सिंह का जाना हमारे जैसे देश के करोड़ों ग़ज़ल प्रेमियों के लिए गहरा आघात है........ग़ज़ल सुनने की ललक और समझ दोनों ही जगजीत सिंह को सुनते हुए हुई.....और सालों से ये सिलसिला चला आ रहा है.....जगजीत सिंह को सुनने के बाद ही गुलाम अली, अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन जैसे फनकारों को भी सुनने और समझने की समझ आई.....जगजीत सिंह भले ही हमारे बिच न रहें लेकिन उनके और चित्र के गए गजल हमेशा उनकी यादों को हमारे जेहन में जिन्दा रखेंगे......उनकी जुगलबंदी मुझे गुलज़ार के साथ सबसे ज्यादा पसंद रही....... निदा फ़ाज़ली के शब्दों को भी अपनी गायकी से उन्होंने लाजवाब बनाया है.....अभी उन्ही की गज़लें सुनते हुए जगजीत जी को श्रद्धांजलि दे रहा हूँ....शाम से आँख में नमी सी है आज फिर आपकी आपकी कमी सी है....आज ये ग़ज़ल जगजीत सिंह जी के अचानक चले जाने से बरबस ही याद आ गई....और वास्तव में मेरी आँखों में नमी है.....जिनसे जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि
Friday, 2 September 2011
हमारा प्रदेश जहाँ सुविधासंपन्न गरीब हैं
पीडीएस में रिश्वतखोरी, छत्तीसगढ़ नंबर १ ये हेड लाइन है आज पत्रिका की, centre for media studies की रिपोर्ट में में ये बात आई है की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक लूटमार है...वाकई में १ रुपये किलो का चावल देकर प्रदेश सर्कार ने वास्तविक गरीबों को कम और फर्जी गरीबों को ज्यादा लाभ पहुँचाया है......इस प्रदेश की विडम्बना ही है कि जिनके पास ऐशो आराम की सारी सुविधाएँ हैं वो गरीबी रेखा में आते हैं....और जो वास्तव में पत्र हैं वो कार्ड बनवाने ठोकरें खा रहे हैं....सार्वजनिक वितरण प्रणाली के राशन और मिट्टीतेल में कितना गोलमाल होता है ये तो जग जाहिर है लेकिन हमारे प्रदेश के सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मॉडल बताया जाता है विदेश से मेहमान आते हैं.....और प्रदेश सर्कार खूब वाहवाही लूटती है लेकिन हकीकत ये है कि किन भी राशन दुकानों में ये मेहमान जाती हैं वे दुकाने पहले से ही चकाचक कर दी जाती हैं न केवल दुकान बल्कि खरीददार मतलब गरीब भी चकाचक होकर राशन खरीदने पहुँचते हैं.....ये मजाक नहीं हकीकत है...कुछ माह पहले विदेशी मेहमान जब बिलासपुर पहुंचे थे तब मेरे एक मित्र ने आँखों देखी हाल बताया था...
Sunday, 28 August 2011
दोषी पुलिस वालों को मिले कठोर सजा
बलरामपुर पुलिस जिले के चांदो थाना क्षेत्र में मीना खलको फर्जी मुठभेड़ में मीना के साथ बलात्कार करने के बाद उसको गोली मरने की बात एन जी ओ बचपन बचाओ आन्दोलन ने कही है....पत्रिका में आज ये खबर छपी है.....ये बात तो पहले से तय थी कि पुलिस के जवानों ने ५ और ६ जुलाई की दरम्यानी रात उस १५ साल की युवती के साथ दुष्कर्म करने के बाद अपनी करतूतों को छुपाने के लिए उसे नक्सली बता दिया......छत्तीसगढ़ में पुलिस कई बार ऐसा कर चुकी है नक्सली क्षेत्रों में आम आदमी को मारने के बाद नक्सली बता दिया जाता है और पुलिस वाले ये सोचते हैं की आसानी से बच जायेंगे.साथ ही सरकार से मेडल भी मिल जायेगा....मीना खलको वाले केस में भी इन पुलिस वालों को केवल लाइन अटेच किया गया है....और जाँच की बात कही है जो अब तक शुरू भी नहीं हो पाई है ऐसे में इतने गंभीर मामले में सरकार कितनी संवेदनशील है इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है..... गंभीर सवाल ये है की जो कानून के रखवाले हैं, जिनके कंधो पर ला एंड आर्डर बनाये रखने की जिम्मेदारी है वे ही इस तरह के कृत्या करने लग जाएँ तो इसे किस अपराध की श्रेणी में रखा जाये...मेरे हिसाब से ऐसे पुलिस वालों को फांसी या फिर उम्र कैद की सजा दी जानी चाहिए...लेकिन सरकार ने कोई गंभीर निर्णय नहीं लिया है...इसलिए मानवाधिकार उल्लंघन की सरकार भी दोषी है क्योंकि इन पुलिस वालों को बचाने का प्रयास न केवल पुलिस विभाग कर रहा है बल्कि कठोर सजा नहीं देकर सरकार भी उनका बचाव ही कर रही है........बचपन बचाओ आन्दोलन या फिर कोई भी मानवाधिकार संगठन सरकार की खामियों को सामने लाती है तो आसानी से उसे कथित मानवाधिकार संगठन कह कर सरकार पल्ल्ला झाड़ने को कोशिश करती है न की अपनी गलतियों को सुधार कर लोगों को न्याय दिलाने की...
Thursday, 25 August 2011
सरकारी कर्मचारियों के बच्चे पढ़ें सरकारी स्कूल में
आज कमल शर्माजी के नोट्स में पढ़ा उन्होंने लिखा है कि नेताओं के बच्चों को सरकारी स्कूल में पढना चाहिए लेकिन मेरा ये मानना है कि नेताओं के साथ ही सरकारी कर्मचारी के बच्चों का सरकारी स्कूल में पढना अनिवार्य करना चाहिए क्योंकि हर आदमी नौकरी तो सरकारी चाहता है लेकिन अपने बच्चों को निजी स्कूल भेजता है..यंहा तक कि शिक्षाकर्मी भी अपने बच्चों की निजी स्कूल में डालते हैं...ऐसे में सरकारी स्कूल का भगवान ही मालिक है.....अधिकांश शिक्षक इमानदारी से आज कल नहीं पढ़ा रहे यही वजह है कि न तो बच्चे और न ही अभिभावक वर्त्तमान में शिकशों को उतना सम्मान देते हैं जितना पहले देते थे...जब किसी अधिकारी का बेटा सरकारी स्कूल में जायेगा तो वो अधिकारी जरुर स्कूल की शिक्षा और गुणवत्ता पर ध्यान देगा....इसी तरह ही शिक्षा व्यवस्था में बदलाव आ सकता है..इसलिए कानूनन ये बदलाव किया जाना चाहिए कि सरकारी कर्मचारी बेटा स्कूल लाइफ सरकारी स्कूल में ही पढ़े..
Tuesday, 23 August 2011
भ्रस्ताचारियों का प्रदेश सरकार कर रही बचाव
सुबह सुबह भास्कर में खबर पढ़ा की प्रदेश के १५० से अधिक भ्रष्ट कानून के फंदे से बाहर हैं वही प्रदेश में एक हजार से भी अधिक मामले लंबित हैं..सबसे बड़ी बात इनमे से ७६ केस तो सरकार दबा कर बैठी है और ई ओ डब्ल्यू और एंटी करप्सन ब्यूरो ने जाँच पूरी कर ली है लेकिन राज्य शासन से अदालत में चालान पेश करने की अनुमति नहीं मिल रही है.... जिसका क्या मतलब निकला जाये की सरकार ऐसे भ्रस्ताचारियों को बचाना चाहती है या फिर ई ओ डब्ल्यू और एंटी करप्सन ब्यूरो सिर्फ दिखावे के लिए बनाये गए.....शिकायत के बाद जिन अधिकारीयों को पकड़ा जाता है उनके खिलाफ क्या कार्यवाही हो रही है पता ही नहीं चलता...उसका कारण तो समझ में आ गया.... ई ओ डब्ल्यू और एंटी करप्सन ब्यूरो में जिस तरह से अधिकारियों की भर्ती की और सरकार ध्यान नहीं दे रही है तो सिर्फ इसलिए की ऐसे भ्रस्ताचारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही न हो....और केस सालों चलता रहे....ऐसे में प्रदेश के मुखिया रमन सिंह द्वारा अन्ना हजारे को समर्थन दिया जाना समझ से परे है.....क्योंकि उनके ही प्रदेश में भ्रस्ताचारियों का बोलबाला है जिनके खिलाफ सरकार कार्यवाही करने रूचि नहीं दिखा रही तो किस मुह से बात करती है समझ नहीं आ रहा...
Tuesday, 16 August 2011
नेताओं का दिखावा
अन्ना के आन्दोलन का का भाजपा पार्टी सहित नेताओं ने फायदा उठाना शुरू कर दिया है. यही वजह है की दुर्ग में भी यहाँ की सांसद सरोज पाण्डेय ने आज शाम को पटेल चौक में मोमबत्ती जलाकर अन्ना का समर्थन किया और केंद्र सरकार की भर्त्सना....लेकिन मुद्दे की बात ये है की भाजपा, कांग्रेस सहित सभी पार्टियाँ यदि इमानदारी से भ्रस्टाचार को खत्म करने की कोशिस करती तो भ्रस्टाचार और जन लोकपाल बिल के मुद्दे को लेकर अन्ना को आन्दोलन की जरुरत ही नहीं पड़ती..केवल फोटो खिंचवाकर अख़बार में दिखने के लिए ही कुछ लोग विरोध करते हैं जो की गलत है. इन नेताओं ने भ्रस्टाचार पर सारी हदें पार कर दी है. जो आग लोगों के दिल में हैं वो आसानी से नहीं बुझेगी.
Monday, 15 August 2011
सरकार की बौखलाहट
अन्ना हजारे के अनशन और आम लोगों के साथ ही मीडिया के द्वारा मिलने वाले समर्थन से कांग्रेस बुरी तरह बौखला गई है.....और कांग्रेस के साथ ही उसके मंत्रियों और प्रवक्ता की हालत देखकर मुझे आरक्षण फिल्म के भ्रस्त और बेईमान प्राचार्य मनोज बाजपाई की याद आ रही है जो ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ प्राचार्य अमिताभ बच्चन द्वारा बच्चों को निशुल्क ही टयूसन पढ़ाने से पगलाए जैसी हालत में पहुँच जाता है. यही हाल अभी कांग्रेस की सरकार का है जो कोई भी सही निर्णय नहीं ले पा रही है. अन्ना के अनशन के नजदीक आते ही कांग्रेसी पगलाते जा रहे हैं. लेकिन एक बात और है कि भाजपाई बड़े खुश हो रहे हैं और अपने आप को दूध का धुला समझ रहे हैं जो की गलत बात है. भाजपाइयों के भी दामन में इतने दाग हैं की धोने से भी नहीं धुल रहा और पार्टी आला कमान का जो नरम रुख है वो बताता है की दाग अच्छे हैं. दिल्ली पोलिस ने जे पी पार्क में अन्ना को अनशन की इजाजत न देकर ये तो बता दिया है की वो सरकार के इशारे पर काम कर रही है और सरकार की नीयत भी इससे उजागर हो गई लेकिन सरकार बाबा रामसेव की तरह अन्ना के साथ बर्ताव करने की न सोचे भुगतना पड़ेगा.
Sunday, 14 August 2011
बंद हो शिक्षा का व्यवसायीकरण
आज आरक्षण फिल्म देखा. बढ़िया फिल्म है. .फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो दलितों या वंचितों के खिलाफ हो बल्कि फिल्म एक तरह से दलितों का समर्थन करती नजर आती है. आरक्षण नाम से ही लोग बवाल मचाने लग गए लेकिन फिल्म की कहानी दरअसल शिक्षा का दलाली करने वालों और कोचिंग सेंटर्स के बहाने शिक्षा का व्यवसायीकरण करने वालों के खिलाफ है. मेरा ये मानना है की जो लोग बिना फिल्म देखे ही फिल्मों पर विवाद खड़ा करते हैं ऐसे लोगों को जेल में डाल देना चाहिए..जिस फिल्म को हमारे देश की सेंसर बोर्ड पास करती है उसके बाद उस पर बवाल करने और राजनितिक रोटी सकने वालों को बक्शा नहीं जाना चाहिए..उन पर क़ानूनी कार्यवाही होनी चाहिए..प्रकाश झा की ये फिल्म उनकी पिछली फिल्म राजनीति से कहीं ज्यादा अच्छी है.दरअसल राजनीती में प्रकाश झा अपने फिल्मों में जो एक आदर्श रूप दिखाते है जिसके साथ आदमी खड़ा होना चाहता है वो राजनीति में नहीं था. फिल्म का हर पत्र धूसर था जिसका कोई सिधांत नहीं था जो कहीं से भी कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पता लेकिन इस फिल्म में अमिताभ का कॉलेज के प्रिन्सिप्ले के रूप में दिखाया गया आदर्शवादी रूप कहीं कहीं दिल को छूता है.
Monday, 11 July 2011
अपने ब्लॉग की शुरुआत मैं दुष्यंत की इस लाइन के साथ करूँगा....बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ, मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं........तीन साल की पत्रकारिता में ऐसे कई मौके आये जब लगा की अपनी बात खुलकर लिखने के लिए सही मंच नहीं मिल रहा......या जो मैं लिखना चाहता हूँ वो मेरे अखबार में छापने की ताकत फिर कहें कि अधिकार मेरे से ऊपर बैठे लोगों को नहीं है........यही वजह है की ब्लॉग लिखकर अपनी बात रख सकूँ. इसी आशा के साथ कि कुछ तो अपनी मन की बात लिख पाउँगा......
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